नई दिल्ली, 21 अगस्त। “अनाथ होना किसी बच्चे की पहचान नहीं, बल्कि समाज की जिम्मेदारी है।” इसी सोच के साथ राजधानी दिल्ली में शुक्रवार को ‘स्वनाथ सम्मेलन’ का आयोजन किया गया। सम्मेलन के जरिए अनाथ एवं देखभाल की जरूरत वाले बच्चों के भविष्य को लेकर व्यापक चर्चा की गई।
गुरु गोबिंद सिंह इंद्रप्रस्थ विश्वविद्यालय के ईस्ट दिल्ली कैंपस, सूरजमल विहार स्थित कन्वेंशन हॉल में आयोजित सम्मेलन में बाल अधिकार, शिक्षा, स्वास्थ्य, कौशल विकास, रोजगार, वित्तीय सहायता और आफ्टर केयर जैसे मुद्दों पर विशेषज्ञों और नीति-निर्माताओं ने विचार रखे। आयोजकों के अनुसार, दिल्ली में पहली बार इस विषय को व्यापक सामाजिक सरोकार के रूप में एक मंच पर लाने की पहल की गई
‘हर बच्चे का सम्मान—हर जीवन का उत्थान’ रहा संदेश
नई उड़ान ट्रस्ट एवं विश्व मंगल्य स्वनाथ परिषद की ओर से आयोजित सम्मेलन का केंद्रीय संदेश ‘हर बच्चे का सम्मान—हर जीवन का उत्थान’ रहा।
कार्यक्रम में आरएसएस के वरिष्ठ प्रचारक प्रशांत हरतालकर, केंद्रीय मंत्री एवं भाजपा दिल्ली प्रदेश अध्यक्ष हर्ष मल्होत्रा, दिल्ली विधानसभा के डिप्टी स्पीकर मोहन सिंह बिष्ट और दिल्ली सरकार के पर्यटन मंत्री कपिल मिश्रा समेत कई प्रमुख हस्तियां शामिल हुईं। वक्ताओं ने बच्चों के सुरक्षित और बेहतर भविष्य के लिए समाज की सामूहिक जिम्मेदारी पर जोर दिया।
केवल संरक्षण नहीं, आत्मनिर्भरता भी जरूरी
सम्मेलन में वक्ताओं ने कहा कि बच्चों को केवल आश्रय और भोजन उपलब्ध कराना पर्याप्त नहीं है। उन्हें गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं, छात्रवृत्ति, कौशल प्रशिक्षण, रोजगार और स्वरोजगार के अवसरों से जोड़ना जरूरी है।
विशेष रूप से 18 वर्ष की उम्र के बाद आफ्टर केयर को लेकर मजबूत व्यवस्था विकसित करने की जरूरत बताई गई, ताकि बाल संरक्षण संस्थानों से बाहर आने के बाद बच्चे अचानक असहाय स्थिति में न पहुंचें।
18 साल की उम्र के बाद भी मिले समाज का साथ
सम्मेलन के अध्यक्ष एवं संयोजक महेंद्र रावत ने कहा कि माता-पिता का साथ न होना किसी बच्चे के भविष्य की सीमा नहीं बनना चाहिए। उन्होंने कहा कि 18 वर्ष की उम्र पूरी होते ही किसी बच्चे को अपने फैसले खुद लेने के लिए अचानक अकेला छोड़ देना उचित नहीं है।
उन्होंने कहा कि शिक्षा से लेकर रोजगार और आर्थिक सहयोग तक समाज और सरकार को ऐसे बच्चों के साथ खड़ा होना होगा।
‘स्वनाथ’ सिर्फ नाम नहीं, सोच में बदलाव की पहल
महेंद्र रावत ने कहा कि ‘स्वनाथ’ केवल एक नाम नहीं, बल्कि सोच में बदलाव का प्रयास है। ऐसे बच्चों की पहचान उनकी परिस्थितियों से नहीं, बल्कि उनकी क्षमता और संभावनाओं से होनी चाहिए।
उन्होंने कहा कि ‘स्वनाथ’ का उद्देश्य बच्चों को अपने जीवन का स्वामी बनाने के साथ उन्हें आत्मनिर्भर और सम्मानजनक जीवन जीने में सक्षम नागरिक बनाना है।
शिक्षा जगत और सरकार की भागीदारी
सम्मेलन में गुरु गोबिंद सिंह इंद्रप्रस्थ विश्वविद्यालय के कुलपति पद्मश्री प्रो. महेश वर्मा ने बच्चों के विकास और वेलनेस से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर विचार रखे।
महिला एवं बाल विकास विभाग की सचिव रश्मि सिंह, आईएएस, दिल्ली बाल अधिकार संरक्षण आयोग के अध्यक्ष डॉ. ओम प्रकाश व्यास तथा सामाजिक क्षेत्र से जुड़े प्रतिनिधियों ने भी बाल अधिकारों और सरकारी योजनाओं पर चर्चा की।
वक्ताओं ने दिल्ली सरकार की ओर से इस वर्ग के बच्चों के लिए उपलब्ध योजनाओं और सुविधाओं की जानकारी साझा की। एम. अली ने सरकारी योजनाओं को जरूरतमंद बच्चों तक प्रभावी ढंग से पहुंचाने की आवश्यकता पर जोर दिया।
वहीं प्रशांत हरतालकर और डॉ. बृषली जोशी ने देश में अनाथ एवं देखभाल की जरूरत वाले बच्चों की स्थिति और उनके सामने मौजूद चुनौतियों पर प्रकाश डाला।
शिक्षा से रोजगार तक तैयार होगा समग्र रोडमैप
सम्मेलन में बच्चों की देखभाल करने वाली संस्थाओं, सरकार, विश्वविद्यालयों, विशेषज्ञों और सामाजिक संगठनों के बीच बेहतर समन्वय की जरूरत बताई गई।
इस पहल का उद्देश्य बच्चों को शिक्षा और छात्रवृत्ति से लेकर कौशल प्रशिक्षण, रोजगार, बैंकिंग एवं वित्तीय साक्षरता, मेंटरशिप और आफ्टर केयर तक एक समग्र सहयोग व्यवस्था उपलब्ध कराना है।
बॉक्स: 18 साल के बाद भी नहीं छूटे हाथ
जिस उम्र में किसी बच्चे को सहारे की सबसे ज्यादा जरूरत होती है, उसी उम्र में 18 साल की सीमा उसे अकेला न छोड़ दे—‘स्वनाथ सम्मेलन’ ने इसी सोच के साथ संरक्षण से आगे बढ़कर सम्मान, अवसर और आत्मनिर्भरता का रास्ता तलाशने की पहल की है।
महेंद्र रावत ने कहा कि यह सम्मेलन किसी एक संस्था का कार्यक्रम नहीं, बल्कि “हर बच्चे के सुरक्षित भविष्य के लिए समाज को एक साथ खड़ा करने की पहल” है।
उन्होंने सरकार, कॉरपोरेट क्षेत्र, शैक्षणिक संस्थानों और सामाजिक संगठनों से अपील की कि वे मिलकर ऐसे बच्चों के लिए दीर्घकालिक सहयोग की व्यवस्था तैयार करें, ताकि 18 वर्ष की उम्र के बाद उनका जीवन असुरक्षा और अकेलेपन में न बीते।







