नई दिल्ली। पैक्ड फूड के पैकेट के सामने चेतावनी वाले लेबल लगाने के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को कड़ी फटकार लगाई है। अदालत ने साफ कहा कि लोगों की सेहत से किसी भी तरह का समझौता नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने विकसित देशों में अपनाए जा रहे फूड-लेबलिंग मानकों को लागू करने में सरकार की हिचकिचाहट पर भी सवाल उठाए।
जस्टिस जेबी पारदीवाला और के. विनोद चंद्रन की पीठ ने केंद्र सरकार को इस मुद्दे पर फैसला लेने के लिए दो सप्ताह का समय दिया है। अदालत ने कहा कि यदि सरकार खुद कोई प्रभावी कदम नहीं उठाती है, तो वह आगे जरूरी निर्देश जारी करने पर विचार करेगी।
‘क्या भारत को अविकसित देश ही बने रहना चाहिए?’
सुनवाई के दौरान जस्टिस पारदीवाला ने केंद्र के उस तर्क पर सवाल उठाया, जिसमें कहा गया था कि भारत फूड लेबलिंग के अंतरराष्ट्रीय मानकों का पालन नहीं कर सकता।
जज ने सवाल किया, “क्या भारत को एक अविकसित देश ही बने रहना चाहिए?” अदालत ने कहा कि फिलहाल इस मामले को केंद्र सरकार के विचार के लिए रखा जा रहा है। यदि सरकार खुद इस दिशा में कदम उठाती है तो यह स्वागत योग्य होगा, अन्यथा कोर्ट आगे निर्देश जारी कर सकता है।
NGO की PIL पर हो रही सुनवाई
यह मामला NGO ‘3S’ और ‘आवर हेल्थ सोसाइटी’ की ओर से दायर जनहित याचिका (PIL) से जुड़ा है। याचिका में पैक्ड फूड उत्पादों पर अनिवार्य रूप से ‘फ्रंट-ऑफ-पैक’ चेतावनी लेबल लगाने की मांग की गई है।
याचिका के वकील राजीव शंकर द्विवेदी ने मांग की है कि पैकेट के सामने ही यह स्पष्ट जानकारी दी जाए कि किसी खाद्य उत्पाद में चीनी, नमक और सैचुरेटेड फैट की मात्रा कितनी है। इससे उपभोक्ताओं को खरीदारी से पहले बेहतर और सूचित फैसला लेने में मदद मिल सकेगी।
FSSAI की कार्रवाई से कोर्ट असंतुष्ट
सुप्रीम कोर्ट इससे पहले फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया (FSSAI) की ओर से उठाए गए कदमों पर भी असंतोष जता चुका है।
अदालत ने कहा था कि अब तक की कवायद से कोई ठोस परिणाम सामने नहीं आया है। इसके बाद कोर्ट ने अधिकारियों से पैक्ड फूड उत्पादों के सामने वाले हिस्से पर सीधे स्वास्थ्य संबंधी चेतावनी छापने की संभावना पर विचार करने को कहा था।
चेतावनी वाले लेबल क्यों जरूरी मान रहा है कोर्ट?
सुप्रीम कोर्ट ने फूड सेफ्टी और पोषण के मुद्दे को संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और स्वास्थ्य के अधिकार से जोड़ा है।
अदालत का जोर इस बात पर है कि अधिक चीनी, नमक और सैचुरेटेड फैट वाले खाद्य पदार्थों से स्वास्थ्य संबंधी जोखिम बढ़ सकते हैं। ऐसे में उपभोक्ताओं को उत्पाद की पोषण संबंधी जानकारी स्पष्ट और आसानी से दिखाई देने वाले तरीके से मिलनी चाहिए, ताकि वे बेहतर विकल्प चुन सकें।
बढ़ता मोटापा भी बड़ी चिंता
भारत में मोटापे और अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड के बढ़ते सेवन को लेकर चिंता के बीच यह मामला और महत्वपूर्ण हो गया है। खासतौर पर बच्चों में बढ़ते मोटापे को लेकर स्वास्थ्य विशेषज्ञ लगातार जागरूकता और बेहतर खान-पान की जरूरत पर जोर देते रहे हैं।
इकोनॉमिक सर्वे 2025-26 में भी मोटापे को स्वास्थ्य से जुड़ी बड़ी चुनौती के रूप में रेखांकित किया गया है। इसमें खराब खान-पान, कम शारीरिक गतिविधि और अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड के अधिक सेवन को इसके प्रमुख कारणों में शामिल किया गया है।
अब केंद्र के फैसले पर नजर
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को दो सप्ताह में इस मुद्दे पर अपना रुख स्पष्ट करने का समय दिया है। अब देखना होगा कि सरकार पैक्ड फूड पर फ्रंट-ऑफ-पैक चेतावनी लेबल को लेकर क्या फैसला करती है। अदालत ने संकेत दिया है कि सरकार की ओर से ठोस कदम नहीं उठाए जाने की स्थिति में वह आगे आवश्यक निर्देश जारी कर सकती है।







