इस मेगा समिट में 11 देशों के राष्ट्राध्यक्ष हिस्सा ले रहे हैं। सात साल बाद भारत आ रहे चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग, रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ-साथ मध्य पूर्व के वे देश भी एक मंच पर हैं, जो क्षेत्रीय तनाव से सीधे प्रभावित हैं—ईरान, यूएई और सऊदी अरब।
इसके अलावा अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की नजरें भी BRICS पर टिकी रहेंगी। ट्रंप लंबे समय से BRICS को अमेरिका के आर्थिक और रणनीतिक हितों के लिए चुनौती मानते रहे हैं। ऐसे में भले ही वह समिट में मौजूद न हों, लेकिन उनका प्रभाव भारत के लिए एक बड़े कूटनीतिक कारक के तौर पर बना रहेगा।
मध्य पूर्व का तनाव बढ़ा सकता है मुश्किल
BRICS समिट का माहौल बेहद संवेदनशील है। मध्य पूर्व में अमेरिका और ईरान के बीच संघर्ष ने वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति को प्रभावित किया है। यूएई और सऊदी अरब ईरान से जुड़े क्षेत्रीय सुरक्षा खतरे को लेकर चिंतित हैं, जबकि ईरान BRICS मंच से अमेरिकी सैन्य कार्रवाई के खिलाफ कड़ा रुख चाहता है।
ऐसे में भारत के लिए तीनों देशों के बीच संतुलन बनाना आसान नहीं होगा। भारत के ईरान के साथ ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संबंध हैं, वहीं सऊदी अरब और यूएई के साथ भी उसके मजबूत रणनीतिक और आर्थिक रिश्ते हैं।
ट्रंप फैक्टर का भी रहेगा दबाव
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप BRICS की गतिविधियों पर लगातार नजर रखते रहे हैं। वह पहले BRICS देशों को डॉलर के विकल्प के तौर पर किसी नई मुद्रा की दिशा में आगे बढ़ने पर 100 प्रतिशत टैरिफ लगाने की चेतावनी दे चुके हैं।
हालांकि भारत ने स्पष्ट किया है कि BRICS का उद्देश्य अमेरिकी डॉलर को चुनौती देने के लिए कोई अलग मुद्रा बनाना नहीं है। भारत ने इसके बजाय राष्ट्रीय मुद्राओं में आपसी व्यापार को बढ़ावा देने की कोशिशों पर जोर दिया है।
भारत के लिए चुनौती यह भी है कि BRICS की पहल को अमेरिका-विरोधी मंच के रूप में पेश न होने दिया जाए। यही कारण है कि नई दिल्ली को वाशिंगटन, मॉस्को, बीजिंग और अन्य BRICS सदस्यों के साथ बेहद सावधानी से संतुलन साधना होगा।
संयुक्त घोषणा पर पहले ही दिख चुके हैं मतभेद
इस साल मई में BRICS विदेश मंत्रियों की बैठक बिना संयुक्त घोषणापत्र के समाप्त हुई थी। यह घटना समूह के भीतर मौजूद गंभीर मतभेदों को उजागर करती है।
मध्य पूर्व के हालात को लेकर ईरान और यूएई के बीच मतभेदों को भी इसका एक प्रमुख कारण माना गया। रिपोर्टों के अनुसार, भारत ने रूस और मिस्र के साथ मिलकर विभिन्न पक्षों के बीच मतभेद कम करने और संयुक्त घोषणापत्र की राह निकालने के लिए बैक-चैनल बातचीत की।
G20 से अलग और ज्यादा जटिल चुनौती
2023 में G20 के दौरान भारत ने यूक्रेन युद्ध को लेकर पश्चिमी देशों और रूस-चीन गुट के बीच सहमति बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। घोषणापत्र में किसी एक पक्ष की सीधी निंदा से बचते हुए क्षेत्रीय अखंडता और संप्रभुता के सिद्धांत पर जोर दिया गया था। साथ ही संदेश दिया गया था कि यह युग युद्ध का नहीं होना चाहिए।
लेकिन BRICS की चुनौती अलग है। यहां मध्य पूर्व का तनाव सीधे उन देशों को एक मंच पर ला रहा है, जो एक-दूसरे के अलग-अलग रणनीतिक हितों से जुड़े हुए हैं।
BRICS में ईरान, यूएई और सऊदी अरब की मौजूदगी भारत के लिए बेहद संवेदनशील स्थिति पैदा करती है। ईरान अमेरिका के खिलाफ कड़ा रुख चाहता है, जबकि खाड़ी देश क्षेत्रीय सुरक्षा और ईरान से जुड़े हमलों के मुद्दे को प्रमुखता दे सकते हैं।
बिश्केक घोषणापत्र की छाया भी अहम
BRICS समिट से कुछ ही समय पहले भारत ने शंघाई सहयोग संगठन (SCO) के बिश्केक घोषणापत्र पर हस्ताक्षर किए थे। इसमें ईरान पर हुए हमलों की निंदा और शांतिपूर्ण परमाणु कार्यक्रम के लिए तेहरान के अधिकार का समर्थन किया गया था।
ऐसे में BRICS की अध्यक्षता के दौरान भारत को यह सुनिश्चित करना होगा कि उसका रुख किसी एक खेमे के समर्थन के तौर पर न देखा जाए।
पूर्व G20 शेरपा अमिताभ कांत ने भी भारत से BRICS अध्यक्षता के दौरान एक परिपक्व और अनुभवी खिलाड़ी की तरह भूमिका निभाने की अपेक्षा जताई है। उनका कहना है कि भारत के लिए अमेरिका, यूरोप और चीन के साथ एक साथ काम करना जरूरी है। BJP उपाध्यक्ष राम माधव ने भी बदलती विश्व व्यवस्था में भारत की संतुलित भूमिका की जरूरत पर जोर दिया है।
BRICS को पश्चिम-विरोधी मंच बनने से रोकने की कोशिश
पिछले कुछ वर्षों में भारत ने BRICS को ‘ग्लोबल साउथ’ की आवाज के तौर पर पेश करने की कोशिश की है, ताकि इसे पश्चिम-विरोधी संगठन के रूप में न देखा जाए।
हालांकि रूस और चीन अमेरिका के नेतृत्व वाली अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को लगातार चुनौती देते रहे हैं। रूस पश्चिमी प्रतिबंधों का सामना कर रहा है, चीन अमेरिका के साथ व्यापारिक तनाव में है और ईरान लंबे समय से अमेरिकी प्रतिबंधों के दायरे में है।
यही स्थिति भारत के लिए BRICS की भूमिका को और महत्वपूर्ण बनाती है। एक ओर नई दिल्ली के अमेरिका के साथ रणनीतिक संबंध मजबूत हुए हैं, वहीं दूसरी ओर रूस के साथ रक्षा और ऊर्जा क्षेत्र में उसके पुराने और महत्वपूर्ण रिश्ते हैं। चीन के साथ भी भारत को अपने जटिल संबंधों को संभालना है।
क्या भारत बना पाएगा आम सहमति?
भारत की विदेश नीति लंबे समय से अलग-अलग शक्ति केंद्रों के साथ समानांतर संबंध बनाए रखने पर आधारित रही है। लेकिन 18वें BRICS शिखर सम्मेलन की अध्यक्षता करते हुए इस नीति की सबसे कठिन परीक्षा हो सकती है।
भारत को अमेरिका और पश्चिमी देशों के साथ अपनी रणनीतिक साझेदारी को मजबूत रखते हुए रूस, चीन, ईरान, सऊदी अरब और यूएई जैसे देशों के साथ भी संवाद बनाए रखना है।
पूर्व राजदूत अनिल त्रिगुनायत के मुताबिक भारत के नेतृत्व और कूटनीतिक कौशल की असली परीक्षा ऐसी घोषणा तैयार करने में होगी, जिसे सभी सदस्य देश स्वीकार कर सकें, यहां तक कि आपसी विवाद में शामिल पक्ष भी।
इसलिए BRICS Summit 2026 सिर्फ एक बहुपक्षीय बैठक नहीं, बल्कि बदलती वैश्विक व्यवस्था में भारत की कूटनीतिक संतुलन साधने की क्षमता की बड़ी परीक्षा बन गया है।







