हरियाली तीज सावन महीने में मनाया जाने वाला प्रमुख हिंदू त्योहार है, जो मुख्य रूप से देवी पार्वती और भगवान शिव को समर्पित माना जाता है। इस दिन सुहागिन महिलाएं पति की लंबी आयु और सुखी वैवाहिक जीवन की कामना से व्रत रखती हैं, जबकि अविवाहित कन्याएं मनचाहा जीवनसाथी पाने की इच्छा से पूजा-अर्चना करती हैं।
हरियाली तीज का धार्मिक महत्व
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, हरियाली तीज का संबंध देवी पार्वती की कठोर तपस्या और भगवान शिव को पति के रूप में प्राप्त करने से जुड़ा है। मान्यता है कि जो महिलाएं श्रद्धा और विधि-विधान से हरियाली तीज का व्रत रखकर भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा करती हैं, उन्हें वैवाहिक सुख और सौभाग्य का आशीर्वाद प्राप्त होता है।
हरियाली तीज व्रत की पौराणिक कथा
पौराणिक कथा के अनुसार, देवी पार्वती अपने पिछले जन्म में सती थीं। वह दक्ष प्रजापति की पुत्री थीं और उन्होंने अपने पिता की इच्छा के विरुद्ध भगवान शिव को पति के रूप में स्वीकार किया था। दक्ष प्रजापति भगवान शिव को पसंद नहीं करते थे, लेकिन अंततः उन्हें सती और शिव के विवाह के लिए सहमत होना पड़ा।
दक्ष प्रजापति ने कराया भव्य यज्ञ
एक बार दक्ष प्रजापति ने एक विशाल यज्ञ का आयोजन किया। इस यज्ञ में उन्होंने सभी देवताओं, ऋषियों, गंधर्वों, किन्नरों और अन्य प्रमुख लोगों को आमंत्रित किया, लेकिन भगवान शिव और देवी सती को निमंत्रण नहीं दिया।
जब सती को यज्ञ के बारे में पता चला तो उन्हें बहुत दुख हुआ। उन्होंने भगवान शिव से अपने पिता के घर जाने की इच्छा जताई। भगवान शिव ने उन्हें बिना निमंत्रण जाने से मना किया और समझाया कि बिना बुलाए किसी आयोजन में जाना उचित नहीं होता।
लेकिन देवी सती अपने निर्णय पर अडिग रहीं और भगवान शिव की अनुमति के बिना अपने मायके चली गईं।
यज्ञ में हुआ देवी सती का अपमान
जब देवी सती यज्ञ स्थल पर पहुंचीं, तो दक्ष प्रजापति ने भगवान शिव के प्रति अपमानजनक व्यवहार किया। अपने पति का अपमान देखकर सती अत्यंत दुखी हो गईं। उन्हें भगवान शिव की बात याद आई और अपनी गलती का एहसास हुआ।
पति के अपमान से आहत होकर देवी सती ने भगवान शिव का ध्यान करते हुए यज्ञ की अग्नि में अपने प्राण त्याग दिए।
भगवान शिव ने लिया सती के अपमान का बदला
जब भगवान शिव को सती के प्राण त्यागने की खबर मिली, तो वे अत्यंत क्रोधित हो गए। उन्होंने अपनी जटा से वीरभद्र को प्रकट किया। वीरभद्र ने दक्ष प्रजापति के यज्ञ को नष्ट कर दिया।
इसके बाद भगवान शिव गहरी तपस्या में लीन हो गए। वहीं, देवी सती ने अगले जन्म में भगवान शिव को पुनः पति के रूप में पाने का संकल्प लिया।
पार्वती के रूप में हुआ देवी सती का पुनर्जन्म
मान्यता के अनुसार, देवी सती ने कई जन्मों तक भगवान शिव को पति के रूप में पाने के लिए तपस्या की। अपने अंतिम जन्म में उन्होंने हिमालय की पुत्री पार्वती के रूप में जन्म लिया।
माता पार्वती बचपन से ही भगवान शिव को अपना पति मानती थीं। उन्हें पाने के लिए उन्होंने कठोर तपस्या की।
सावन में की भगवान शिव की आराधना
कथा के अनुसार, माता पार्वती ने सावन महीने में मिट्टी से शिवलिंग बनाया और पूरी श्रद्धा के साथ भगवान शिव की पूजा की। उन्होंने कठोर तपस्या और व्रत के माध्यम से भगवान शिव को प्रसन्न करने का प्रयास किया।
माता पार्वती की अटूट भक्ति और तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव उनके सामने प्रकट हुए। उन्होंने माता पार्वती को वरदान दिया कि वे उनकी पत्नी बनेंगी।
हरियाली तीज पर पूरी हुई मनोकामना
पौराणिक मान्यता के अनुसार, हरियाली तीज के शुभ दिन माता पार्वती की भगवान शिव को पति के रूप में पाने की मनोकामना पूरी हुई। इसी कारण हरियाली तीज को शिव-पार्वती के प्रेम, समर्पण और वैवाहिक सुख का प्रतीक माना जाता है।
मान्यता है कि अविवाहित कन्याएं श्रद्धापूर्वक हरियाली तीज का व्रत रखकर भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा करती हैं तो उन्हें योग्य जीवनसाथी का आशीर्वाद मिलता है। वहीं, विवाहित महिलाएं यह व्रत पति की लंबी आयु, सुखी दांपत्य जीवन और परिवार की खुशहाली की कामना से रखती हैं।
हरियाली तीज पर क्या सीख मिलती है?
हरियाली तीज की कथा पति-पत्नी के बीच प्रेम, विश्वास, समर्पण और धैर्य का संदेश देती है। माता पार्वती की तपस्या यह प्रेरणा देती है कि सच्ची श्रद्धा, निष्ठा और दृढ़ संकल्प से कठिन से कठिन लक्ष्य को भी प्राप्त किया जा सकता है।







