श्रीकृष्ण जन्माष्टमी हिंदू धर्म के प्रमुख त्योहारों में से एक है। यह पर्व भगवान विष्णु के आठवें अवतार भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव के रूप में मनाया जाता है। इस दिन देशभर के मंदिरों और घरों में विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। बड़ी संख्या में श्रद्धालु व्रत रखते हैं और भगवान श्रीकृष्ण के बाल स्वरूप की पूजा करते हैं।
जन्माष्टमी की सबसे खास परंपरा यह है कि भगवान श्रीकृष्ण की जन्म पूजा आधी रात यानी मध्यरात्रि में की जाती है। मंदिरों में रात 12 बजे भगवान का जन्मोत्सव मनाया जाता है। इसके बाद बाल गोपाल का अभिषेक, श्रृंगार और आरती की जाती है। लेकिन सवाल यह है कि श्रीकृष्ण का जन्म आधी रात को ही क्यों हुआ और उनकी पूजा भी इसी समय क्यों की जाती है? इसके पीछे एक प्रसिद्ध पौराणिक कथा जुड़ी हुई है।
मथुरा के राजा कंस का बढ़ता अत्याचार
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, द्वापर युग में मथुरा पर राजा कंस का शासन था। कंस बेहद क्रूर और अत्याचारी राजा था। वह अपनी प्रजा पर तरह-तरह के अत्याचार करता था।
कंस की बहन देवकी का विवाह वसुदेव जी के साथ हुआ था। विवाह के बाद जब कंस अपनी बहन देवकी और उनके पति वसुदेव को विदा करके ले जा रहा था, तभी आकाशवाणी हुई कि देवकी की आठवीं संतान कंस के विनाश का कारण बनेगी।
यह सुनकर कंस भयभीत हो गया। उसने देवकी और वसुदेव को कारागार में बंद कर दिया और उनकी संतानों की हत्या करने लगा।
देवकी की छह संतानों की कंस ने की हत्या
कथा के अनुसार, देवकी और वसुदेव की पहली छह संतानों को कंस ने जन्म लेते ही मार डाला। इसके बाद सातवीं संतान के रूप में बलराम जी का जन्म हुआ।
मान्यता है कि योगमाया की शक्ति से बलराम जी को देवकी के गर्भ से रोहिणी के गर्भ में स्थानांतरित कर दिया गया। इस कारण कंस को लगा कि देवकी की सातवीं संतान का गर्भपात हो गया है।
इसके बाद देवकी की आठवीं संतान के रूप में स्वयं भगवान विष्णु ने श्रीकृष्ण के रूप में अवतार लेने का निर्णय किया। भगवान श्रीकृष्ण का अवतार कंस के अत्याचार का अंत करने और धर्म की स्थापना के लिए हुआ।
मध्यरात्रि में हुआ भगवान श्रीकृष्ण का जन्म
पौराणिक कथा के अनुसार, भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को रोहिणी नक्षत्र और मध्यरात्रि के समय भगवान श्रीकृष्ण का जन्म हुआ।
उस समय पूरी मथुरा नगरी अंधकार में डूबी हुई थी और लोग गहरी नींद में सो रहे थे। मान्यता है कि श्रीकृष्ण के जन्म के समय कारागार में अचानक दिव्य प्रकाश फैल गया।
भगवान विष्णु ने देवकी और वसुदेव को अपने चतुर्भुज स्वरूप में दर्शन दिए। उनके हाथों में शंख, चक्र, गदा और पद्म थे। भगवान ने बताया कि वे उनके पुत्र के रूप में जन्म ले चुके हैं और वसुदेव को उन्हें गोकुल में नंद बाबा के घर पहुंचाना होगा।
वसुदेव बाल कृष्ण को लेकर पहुंचे गोकुल
भगवान श्रीकृष्ण के जन्म के बाद कारागार के सभी पहरेदार गहरी नींद में सो गए। कारागार के दरवाजे भी अपने आप खुल गए। इसके बाद वसुदेव जी बाल कृष्ण को एक टोकरी में रखकर गोकुल की ओर चल पड़े।
उस समय यमुना नदी उफान पर थी। वसुदेव जी बाल कृष्ण को सिर पर रखकर यमुना पार करने लगे। पौराणिक मान्यता है कि इस दौरान शेषनाग ने अपने फन फैलाकर बाल कृष्ण को वर्षा से बचाया।
गोकुल पहुंचने पर वसुदेव जी ने बाल कृष्ण को यशोदा जी के पास छोड़ दिया और वहां जन्मी कन्या को अपने साथ मथुरा के कारागार में ले आए।
जब कंस उस कन्या को मारने पहुंचा तो वह उसके हाथ से छूटकर आकाश में चली गई और देवी के रूप में प्रकट हुई। देवी ने कंस को चेतावनी दी कि उसका संहार करने वाला जन्म ले चुका है।
आधी रात में ही क्यों होती है श्रीकृष्ण की पूजा?
भगवान श्रीकृष्ण का जन्म मध्यरात्रि में हुआ था। इसी कारण जन्माष्टमी के दिन भी रात 12 बजे भगवान के जन्म का उत्सव मनाने की परंपरा है।
मध्यरात्रि में भक्त बाल गोपाल का पंचामृत और गंगाजल से अभिषेक करते हैं। इसके बाद उन्हें नए वस्त्र पहनाए जाते हैं, सुंदर श्रृंगार किया जाता है और झूले में विराजमान कराया जाता है। भगवान को माखन-मिश्री, धनिया की पंजीरी और अन्य प्रसाद अर्पित किए जाते हैं।
इसके बाद भक्त भगवान श्रीकृष्ण की आरती करते हैं और उनके जन्म की खुशी में भजन-कीर्तन करते हैं।
अंधकार में प्रकाश का प्रतीक है श्रीकृष्ण का जन्म
श्रीकृष्ण का मध्यरात्रि में जन्म केवल एक धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि इसका आध्यात्मिक महत्व भी माना जाता है।
आधी रात चारों ओर अंधकार का समय होती है और इसी अंधकार के बीच भगवान श्रीकृष्ण का जन्म प्रकाश, आशा और धर्म की विजय का प्रतीक माना जाता है।
श्रीकृष्ण का जन्म यह संदेश देता है कि जब संसार में अधर्म और अन्याय बढ़ जाता है, तब ईश्वर धर्म की स्थापना के लिए अवतार लेते हैं। यही कारण है कि जन्माष्टमी की रात भक्त मध्यरात्रि तक भगवान के जन्म का इंतजार करते हैं।
जन्माष्टमी पर क्यों रखा जाता है व्रत?
जन्माष्टमी के दिन बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपवास रखते हैं। कई भक्त पूरे दिन अन्न ग्रहण नहीं करते और रात 12 बजे भगवान श्रीकृष्ण के जन्म के बाद व्रत खोलते हैं।
मान्यता है कि जन्माष्टमी पर श्रद्धा और भक्ति के साथ भगवान श्रीकृष्ण की पूजा करने से मन को शांति मिलती है और भगवान की कृपा प्राप्त होती है। हालांकि व्रत की विधि और पारण की परंपरा अलग-अलग परिवारों और क्षेत्रों में भिन्न हो सकती है।
श्रीकृष्ण जन्माष्टमी देता है धर्म और सत्य का संदेश
श्रीकृष्ण जन्माष्टमी केवल भगवान के जन्म का उत्सव नहीं, बल्कि धर्म, सत्य, प्रेम और कर्म का संदेश देने वाला पर्व भी है। भगवान श्रीकृष्ण ने अपने जीवन और भगवद्गीता के उपदेशों के माध्यम से मनुष्य को अपने कर्तव्य का पालन करने और सही मार्ग पर चलने की प्रेरणा दी।
जन्माष्टमी हमें यह विश्वास दिलाती है कि परिस्थितियां कितनी भी कठिन क्यों न हों, अंततः सत्य और धर्म की विजय होती है।
कंस के अत्याचार के बीच भगवान श्रीकृष्ण का जन्म इसी विश्वास का प्रतीक है। इसलिए जन्माष्टमी की मध्यरात्रि में जब मंदिरों में घंटियां बजती हैं, शंखनाद होता है और भक्त “नंद के घर आनंद भयो, जय कन्हैया लाल की” का जयघोष करते हैं, तो वह केवल उत्सव नहीं बल्कि उस दिव्य क्षण को याद करने का अवसर होता है, जब भगवान श्रीकृष्ण ने धरती पर अवतार लेकर अधर्म के अंत और धर्म की स्थापना का मार्ग प्रशस्त किया था।







