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रामायण: लंका के चारों मुख्य द्वारों की रक्षा किसे सौंपी गई थी?

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admin
31 जुलाई 2026 को 05:28 am बजे
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रामायण में स्वर्णमयी लंका का वर्णन केवल उसकी समृद्धि और वैभव के लिए ही नहीं, बल्कि उसकी अभेद्य सुरक्षा व्यवस्था के लिए भी मिलता है। रावण ने अपनी राजधानी को इस प्रकार सुरक्षित बनाया था कि कोई भी शत्रु बिना अनुमति उसके भीतर प्रवेश न कर सके। जब भगवान श्रीराम की वानर सेना समुद्र पार कर लंका पहुंची, तब सबसे पहले उन्हें विशाल दुर्गों, ऊंची प्राचीरों, गहरी खाइयों और चारों दिशाओं में बने मुख्य द्वारों की सुरक्षा व्यवस्था का सामना करना पड़ा।

वाल्मीकि रामायण के युद्धकाण्ड में लंका के चारों मुख्य द्वारों पर नियुक्त प्रमुख राक्षस सेनापतियों का विस्तार से उल्लेख मिलता है। रावण ने प्रत्येक द्वार की सुरक्षा अपने सबसे पराक्रमी योद्धाओं को सौंपी थी।

रावण ने बनाई थी अभेद्य सुरक्षा रणनीति

रावण केवल बलशाली योद्धा ही नहीं, बल्कि एक कुशल शासक और रणनीतिकार भी था। उसने लंका को चारों ओर से मजबूत किलों, ऊंची दीवारों, गहरी खाइयों और विशाल प्रवेश द्वारों से सुरक्षित किया था। प्रत्येक द्वार पर हजारों राक्षस सैनिक तैनात रहते थे।

जब विभीषण ने भगवान श्रीराम की शरण ली, तब उन्होंने लंका की सैन्य व्यवस्था, किलों और चारों मुख्य द्वारों पर तैनात सेनापतियों की पूरी जानकारी श्रीराम को दी। इसी आधार पर श्रीराम ने युद्ध की रणनीति तैयार की।

पूर्व द्वार की रक्षा प्रहस्त को सौंपी गई थी

लंका के पूर्वी द्वार की सुरक्षा रावण के सेनापति प्रहस्त के हाथों में थी। प्रहस्त रावण की सेना का सबसे अनुभवी और शक्तिशाली सेनानायक माना जाता था। युद्ध के दौरान उसने वानर सेना का डटकर सामना किया, लेकिन अंततः वानरराज नील के हाथों उसका वध हो गया।

दक्षिण द्वार की रक्षा महापार्श्व और महोदर के जिम्मे थी

लंका के दक्षिणी द्वार की सुरक्षा का दायित्व महापार्श्व और महोदर को दिया गया था। ये दोनों रावण के विश्वसनीय और पराक्रमी योद्धा थे। युद्ध के दौरान दोनों ने राक्षस सेना का नेतृत्व किया, लेकिन श्रीराम की सेना के सामने अधिक समय तक टिक नहीं सके और युद्ध में मारे गए।

पश्चिम द्वार की रक्षा इंद्रजीत कर रहा था

लंका के पश्चिमी द्वार की रक्षा रावण के सबसे शक्तिशाली पुत्र मेघनाद (इंद्रजीत) को सौंपी गई थी। इंद्रजीत ने देवताओं के राजा इंद्र को पराजित करने के बाद “इंद्रजीत” की उपाधि प्राप्त की थी।

वह मायावी युद्ध, दिव्य अस्त्रों और अदृश्य होकर लड़ने की क्षमता के कारण सबसे खतरनाक योद्धा माना जाता था। युद्ध में उसने नागपाश से श्रीराम और लक्ष्मण को बांध दिया था। बाद में गरुड़ के आगमन से दोनों मुक्त हुए। निकुंभिला में यज्ञ के दौरान लक्ष्मण ने विभीषण की सलाह पर उसका यज्ञ भंग किया और अंततः उसका वध कर दिया।

उत्तर द्वार की रक्षा स्वयं रावण ने संभाली थी

लंका के उत्तर द्वार की सुरक्षा स्वयं रावण ने अपने हाथों में रखी थी। इससे स्पष्ट होता है कि वह इस दिशा को सबसे महत्वपूर्ण मानता था। रावण अपनी विशाल सेना के साथ इसी द्वार पर तैनात रहता था और यहीं से युद्धभूमि में प्रवेश कर सेना का नेतृत्व करता था।

युद्ध के अंतिम चरण में भगवान श्रीराम और रावण का आमना-सामना भी इसी दिशा में हुआ। अंततः श्रीराम ने ब्रह्मास्त्र के प्रभाव से रावण का वध कर धर्म की विजय सुनिश्चित की।

विभीषण ने श्रीराम को बताई थी पूरी सैन्य व्यवस्था

रावण का साथ छोड़ने के बाद विभीषण ने श्रीराम को लंका की पूरी सैन्य संरचना की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि किस द्वार पर कौन-सा सेनापति तैनात है, किसके पास कितनी सेना है और कौन-सा योद्धा किस प्रकार की युद्ध नीति अपनाता है।

इस जानकारी के आधार पर श्रीराम ने वानर सेना को अलग-अलग दलों में विभाजित कर चारों दिशाओं से एक साथ आक्रमण करने की योजना बनाई।

चारों द्वारों पर एक साथ हुआ था आक्रमण

युद्धकाण्ड के अनुसार श्रीराम की वानर सेना ने केवल एक दिशा से नहीं, बल्कि लंका के चारों मुख्य द्वारों पर एक साथ धावा बोला। इससे राक्षस सेना चारों ओर से घिर गई।

वानर पर्वतों, वृक्षों और विशाल शिलाओं से युद्ध कर रहे थे, जबकि राक्षस दिव्य अस्त्र, तलवार, गदा और बाणों का प्रयोग कर रहे थे। कई दिनों तक चले इस भीषण युद्ध में रावण के प्रमुख योद्धा एक-एक कर पराजित होते गए।

युद्धकाण्ड में मिलता है चारों द्वारों का वर्णन

वाल्मीकि रामायण के युद्धकाण्ड के अनुसार—

पूर्व द्वार – प्रहस्त

दक्षिण द्वार – महापार्श्व और महोदर

पश्चिम द्वार – इंद्रजीत (मेघनाद)

उत्तर द्वार – स्वयं रावण

इन सभी योद्धाओं को विशाल राक्षस सेना का नेतृत्व सौंपा गया था ताकि कोई भी शत्रु लंका में प्रवेश न कर सके। लेकिन विभीषण की रणनीतिक जानकारी और श्रीराम की योजनाबद्ध युद्धनीति के कारण लंका की अभेद्य मानी जाने वाली सुरक्षा व्यवस्था धीरे-धीरे ध्वस्त हो गई। अंततः रावण का वध हुआ और धर्म की विजय के साथ लंका का महान युद्ध समाप्त हुआ।

रामायण का यह प्रसंग बताता है कि केवल बल और अभेद्य किले ही विजय की गारंटी नहीं होते। सही रणनीति, नेतृत्व और धर्म का साथ अंततः विजय दिलाता है। रावण ने लंका के चारों द्वारों की रक्षा अपने सबसे शक्तिशाली योद्धाओं को सौंपी थी, लेकिन भगवान श्रीराम की नीति, विभीषण की जानकारी और वानर सेना के पराक्रम के आगे उसकी पूरी सुरक्षा व्यवस्था ध्वस्त हो गई।