हनुमान जी द्वारा लंका दहन का प्रसंग रामायण का सबसे प्रसिद्ध और चमत्कारिक प्रसंग माना जाता है। माता सीता की खोज करते हुए जब हनुमान जी लंका पहुंचे, तब उन्होंने अशोक वाटिका में माता सीता को भगवान श्रीराम का संदेश दिया। इसके बाद रावण की सेना का सामना किया और अंततः रावण के आदेश पर उनकी पूंछ में आग लगा दी गई।
लेकिन यही आग कुछ ही क्षणों में पूरी स्वर्णमयी लंका के विनाश का कारण बन गई। वाल्मीकि रामायण, रामचरितमानस और अन्य धार्मिक ग्रंथों में वर्णन मिलता है कि हनुमान जी ने अपनी जलती हुई पूंछ से लंका के महलों, राजप्रासादों और भवनों को अग्नि के हवाले कर दिया। हालांकि, इस पूरे लंका दहन के दौरान एक ऐसा महल था, जिसे अग्नि छू भी नहीं सकी। वह था रावण के छोटे भाई विभीषण का महल। आखिर ऐसा क्यों हुआ? आइए जानते हैं।
जब हनुमान जी पहुंचे लंका
सुंदरकांड के अनुसार, समुद्र पार कर हनुमान जी रात्रि के समय लंका पहुंचे और पूरी नगरी का निरीक्षण किया। उन्होंने देखा कि लंका सोने से बनी अत्यंत भव्य नगरी थी। चारों ओर विशाल महल, ऊंचे द्वार और सुंदर भवन थे। नगर में घूमते हुए उन्होंने अनेक राक्षसों के निवास देखे, लेकिन एक भवन ऐसा भी था जो अन्य सभी महलों से अलग दिखाई दे रहा था।
विभीषण के महल की पहचान कैसे हुई?
धार्मिक कथाओं के अनुसार, हनुमान जी ने जिस भवन को देखा उसके बाहर भगवान विष्णु के आयुधों के चिह्न बने हुए थे। इतना ही नहीं, उस भवन के आसपास तुलसी के पौधे भी लगे थे।
लंका जैसी राक्षसों की नगरी में भगवान के प्रतीक और तुलसी का होना इस बात का संकेत था कि वहां कोई परम भक्त निवास करता है। बाद में हनुमान जी की भेंट विभीषण से हुई। दोनों के बीच श्रीराम का नाम लेकर संवाद हुआ और विभीषण ने स्वयं को भगवान श्रीराम का भक्त बताया। उन्होंने हनुमान जी को माता सीता का स्थान भी बताया तथा आगे की योजना में महत्वपूर्ण सहायता की।
रावण ने क्यों लगवाई हनुमान जी की पूंछ में आग?
माता सीता से मिलने के बाद हनुमान जी ने अशोक वाटिका में उत्पात मचाया। उन्होंने अनेक वृक्ष उखाड़ दिए और राक्षसों का संहार किया। इसके बाद मेघनाद ने ब्रह्मास्त्र का प्रयोग कर उन्हें बंदी बना लिया और रावण की सभा में प्रस्तुत किया।
सभा में रावण पहले हनुमान जी को मृत्युदंड देना चाहता था, लेकिन विभीषण ने इसका विरोध किया। उन्होंने कहा कि किसी दूत की हत्या करना शास्त्रों और राजधर्म के विरुद्ध है। विभीषण की बात मानते हुए रावण ने आदेश दिया कि हनुमान जी की पूंछ में कपड़ा और तेल बांधकर आग लगा दी जाए, ताकि उनका अपमान किया जा सके।
कैसे हुआ लंका दहन?
राक्षसों ने हनुमान जी की पूंछ में आग लगा दी। इसके बाद हनुमान जी ने अपना विशाल रूप धारण किया, बंधनों से मुक्त हुए और एक महल से दूसरे महल पर छलांग लगाते हुए पूरी लंका में आग फैला दी।
तेज हवा के कारण आग तेजी से फैल गई। रावण का राजमहल, सेनापतियों के भवन और स्वर्णमयी लंका के अधिकांश महल देखते ही देखते अग्नि की लपटों में घिर गए। इस प्रकार हनुमान जी ने रावण की शक्ति को कमजोर करने और उसे श्रीराम की शक्ति का संदेश देने के लिए लंका दहन किया।
विभीषण का महल क्यों नहीं जला?
पौराणिक कथाओं के अनुसार, हनुमान जी ने जानबूझकर विभीषण के महल को अग्नि से सुरक्षित रखा। इसका सबसे बड़ा कारण यह था कि विभीषण भगवान श्रीराम के परम भक्त थे। उन्होंने कभी अधर्म का साथ नहीं दिया और बार-बार रावण को माता सीता को सम्मानपूर्वक श्रीराम के पास लौटाने की सलाह दी थी।
हनुमान जी समझ चुके थे कि विभीषण का हृदय श्रीराम की भक्ति से परिपूर्ण है। जहां भगवान का स्मरण, तुलसी का वास और धर्म का पालन होता है, उस स्थान को नष्ट करना उचित नहीं माना जाता। इसलिए लंका दहन के दौरान विभीषण का महल सुरक्षित रहा।
अग्निदेव ने भी नहीं पहुंचाई कोई हानि
धार्मिक मान्यता के अनुसार, हनुमान जी पवनपुत्र हैं और अग्निदेव भी उनके प्रति अनुकूल थे। जिस प्रकार माता सीता अग्निदेव की कृपा से अग्नि की तपन से सुरक्षित रहीं, उसी प्रकार भगवान के भक्त विभीषण के निवास को भी अग्नि ने कोई नुकसान नहीं पहुंचाया।
मान्यता है कि जहां ईश्वर की भक्ति और धर्म का वास होता है, वहां दैवी शक्तियां स्वयं रक्षा करती हैं। यही कारण है कि विभीषण का महल अग्नि की लपटों से सुरक्षित रहा।
विभीषण ने हमेशा धर्म का साथ दिया
रामायण के अनुसार, विभीषण ने कई बार रावण को समझाया कि माता सीता का हरण अधर्म है और उन्हें सम्मानपूर्वक श्रीराम को लौटा देना चाहिए। उन्होंने श्रीराम की शक्ति का भी वर्णन किया और युद्ध टालने की सलाह दी, लेकिन रावण ने उनकी बात नहीं मानी।
यही नहीं, जब हनुमान जी रावण की सभा में पहुंचे थे, तब भी विभीषण ने दूत की हत्या का विरोध किया। इस धर्मनिष्ठ व्यवहार के कारण हनुमान जी उनके प्रति विशेष सम्मान रखते थे।
लंका दहन के बाद विभीषण बने लंकापति
जब रावण ने विभीषण का अपमान कर उन्हें सभा से निकाल दिया, तब वे भगवान श्रीराम की शरण में पहुंचे। श्रीराम ने उन्हें बिना किसी संकोच के स्वीकार किया और भविष्य का लंकापति घोषित किया।
राम-रावण युद्ध में रावण के वध के बाद भगवान श्रीराम ने विभीषण का विधिवत राज्याभिषेक कराया। इस प्रकार विभीषण, जिनका महल लंका दहन के समय सुरक्षित रहा था, आगे चलकर लंका के धर्मनिष्ठ और न्यायप्रिय राजा बने। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, उनका महल सुरक्षित रहना इसी दिव्य भविष्य का संकेत भी माना जाता है।







