मंगला गौरी व्रत सावन के पवित्र महीने में रखा जाने वाला महत्वपूर्ण व्रत है। सावन के प्रत्येक मंगलवार को सुहागिन महिलाएं माता गौरी की पूजा कर अपने पति की लंबी आयु, अखंड सौभाग्य और दांपत्य जीवन में सुख-शांति की कामना करती हैं। धार्मिक मान्यता है कि मंगला गौरी व्रत के साथ इस कथा का पाठ या श्रवण करने से माता पार्वती की कृपा प्राप्त होती है।
वर्ष 2026 में सावन का तीसरा मंगला गौरी व्रत 18 अगस्त, मंगलवार को रखा जा रहा है। आइए जानते हैं मंगला गौरी व्रत से जुड़ी प्रसिद्ध पौराणिक कथा।
कुंडिन नगर में रहता था धर्मपाल नाम का व्यापारी
प्राचीन समय में कुंडिन नामक एक सुंदर नगर था। वहां धर्मपाल नाम का एक धनवान व्यापारी रहता था। उसके पास धन-दौलत और सुख-सुविधाओं की कोई कमी नहीं थी। उसकी पत्नी भी धार्मिक और पतिव्रता थी। दोनों पति-पत्नी सुखपूर्वक जीवन व्यतीत कर रहे थे, लेकिन उन्हें एक बात का दुख था कि उनकी कोई संतान नहीं थी।
एक दिन धर्मपाल के घर एक तपस्वी संन्यासी भिक्षा मांगने आया। धर्मपाल की पत्नी के मन में पुत्र प्राप्ति की तीव्र इच्छा थी। उसने सोचा कि यदि वह तपस्वी को स्वर्ण दान करेगी तो शायद उसे पुत्र की प्राप्ति हो जाएगी।
पति की सहमति से उसने भिक्षा में कुछ सोना छिपाकर डाल दिया। लेकिन तपस्वी धन स्वीकार नहीं करता था। भिक्षा में सोना देखकर वह क्रोधित हो गया और उसने धर्मपाल तथा उसकी पत्नी को संतानहीन रहने का शाप दे दिया।
धर्मपाल और उसकी पत्नी तपस्वी के चरणों में गिर पड़े और अपनी भूल के लिए क्षमा मांगने लगे। उनकी प्रार्थना से तपस्वी का क्रोध शांत हुआ। उसने धर्मपाल की पत्नी को सावन के मंगलवार को मंगला गौरी व्रत करने की सलाह दी और इसकी विधि भी बताई।
मंगला गौरी व्रत से मिली पुत्र प्राप्ति की कृपा
धर्मपाल की पत्नी ने श्रद्धापूर्वक मंगला गौरी व्रत करना शुरू किया। वह माता पार्वती की विधिपूर्वक पूजा कर संतान प्राप्ति की प्रार्थना करने लगी।
कथा के अनुसार उसकी भक्ति से माता पार्वती प्रसन्न हुईं और भगवान शिव से धर्मपाल दंपती को पुत्र का वरदान देने का आग्रह किया। कुछ समय बाद धर्मपाल को एक रात स्वप्न में दिव्य संकेत मिला। उसे बताया गया कि पास के वन में आम के पेड़ के नीचे भगवान गणेश की प्रतिमा है। वहां से आम लाकर पत्नी को खिलाने पर उन्हें पुत्र की प्राप्ति होगी।
धर्मपाल सुबह वन में गया। उसे आम का पेड़ और उसके नीचे भगवान गणेश की प्रतिमा दिखाई दी। आम तोड़ने के लिए उसने पत्थर चलाया, लेकिन एक पत्थर गणेश प्रतिमा पर जा लगा।
भगवान गणेश ने दिया पुत्र के अल्पायु होने का श्राप
प्रतिमा पर पत्थर लगने से भगवान गणेश प्रकट हुए और धर्मपाल से नाराज हुए। उन्होंने कहा कि पुत्र प्राप्ति की इच्छा में उसने भगवान की प्रतिमा पर पत्थर मारकर अपराध किया है।
भगवान गणेश ने बताया कि माता पार्वती की कृपा से उसे पुत्र तो प्राप्त होगा, लेकिन वह अल्पायु होगा और 21 वर्ष की आयु में उसकी मृत्यु हो जाएगी।
धर्मपाल यह सुनकर दुखी हो गया। वह आम लेकर घर लौट आया, लेकिन उसने अपनी पत्नी को इस श्राप के बारे में कुछ नहीं बताया।
कुछ समय बाद धर्मपाल के घर पुत्र का जन्म हुआ। पूरा परिवार खुशी से भर गया, लेकिन धर्मपाल के मन में पुत्र की अल्पायु को लेकर चिंता बनी रही।
कमला और मंगला के संवाद से सामने आई व्रत की महिमा
समय बीतने के साथ धर्मपाल का पुत्र बड़ा होने लगा। जब वह 20 वर्ष का हुआ तो वह अपने पिता के काम में हाथ बंटाने लगा। एक दिन धर्मपाल अपने पुत्र के साथ यात्रा पर निकला। रास्ते में दोनों एक सरोवर के किनारे विश्राम करने लगे।
उसी सरोवर के पास दो युवतियां कमला और मंगला जल भरने और वस्त्र धोने आई थीं। दोनों सावन के व्रतों को लेकर बातचीत कर रही थीं।
कमला ने बताया कि वह सावन के प्रत्येक मंगलवार को मंगला गौरी व्रत करती है। उसने मंगला को भी माता गौरी का यह व्रत करने की सलाह दी। कमला ने बताया कि माता गौरी की पूजा और मंगला गौरी व्रत से सुहाग की रक्षा तथा वैवाहिक जीवन में सुख-समृद्धि के लिए देवी की कृपा प्राप्त होती है।
मंगला ने भी व्रत करने का संकल्प ले लिया। धर्मपाल ने दोनों की बातचीत सुनी और उसके मन में विचार आया कि मंगला गौरी व्रत करने वाली कन्या के वैवाहिक जीवन पर माता गौरी की विशेष कृपा रहती है।
इसके बाद धर्मपाल ने मंगला के पिता के सामने अपने पुत्र के विवाह का प्रस्ताव रखा। प्रस्ताव स्वीकार कर लिया गया और दोनों का विवाह विधिपूर्वक संपन्न हो गया। विवाह के बाद भी मंगला ने मंगला गौरी व्रत करना जारी रखा।
माता पार्वती ने स्वप्न में बताया पति की मृत्यु का रहस्य
मंगला की श्रद्धा और भक्ति से माता पार्वती प्रसन्न हुईं। एक रात माता पार्वती ने उसे स्वप्न में दर्शन दिए।
माता ने मंगला को बताया कि उसके पति की आयु अल्प है और आने वाले मंगलवार को एक विषैला सर्प उसके पति के प्राण लेने आएगा। माता पार्वती ने उसे संकट से बचने का उपाय भी बताया।
उन्होंने कहा कि मंगला एक पात्र में मीठा दूध रखे और उसके पास एक खाली घड़ा रख दे। जब सर्प दूध पीने आएगा तो दूध पीने के बाद वह घड़े में प्रवेश कर जाएगा। इसके बाद मंगला घड़े का मुंह कपड़े से बंद कर दे।
मंगला ने माता पार्वती के आदेश का पालन करने का निश्चय किया।
मंगला गौरी व्रत के प्रभाव से बची पति की जान
अगले मंगलवार को मंगला ने एक पात्र में मीठा दूध रखा और उसके पास खाली घड़ा रख दिया। कुछ समय बाद एक विषैला सर्प वहां आया। उसने दूध पिया और फिर पास रखे घड़े में प्रवेश कर गया।
मंगला ने तुरंत घड़े का मुंह कपड़े से बंद कर दिया। इस प्रकार माता पार्वती की कृपा से उसके पति के प्राण बच गए और मृत्यु का संकट टल गया।
जब धर्मपाल और उसकी पत्नी को इस घटना की जानकारी हुई तो वे माता गौरी की कृपा से भाव-विभोर हो गए। पूरे परिवार ने माता गौरी की पूजा की और मंगला गौरी व्रत की महिमा का स्मरण किया।
मंगला गौरी व्रत कथा का धार्मिक महत्व
धार्मिक मान्यता के अनुसार मंगला गौरी व्रत माता पार्वती को समर्पित है। सुहागिन महिलाएं इस दिन व्रत रखकर माता गौरी की पूजा करती हैं और पति की दीर्घायु, अखंड सौभाग्य तथा दांपत्य जीवन में सुख-शांति की कामना करती हैं।
सावन के मंगलवार को पूजा के बाद श्रद्धापूर्वक मंगला गौरी व्रत कथा का पाठ या श्रवण करने की परंपरा है। मान्यता है कि माता गौरी की आराधना और व्रत-कथा के श्रवण से दांपत्य जीवन में सुख-समृद्धि और सौभाग्य की कामना पूरी होती है।







