प्रदर्शन में शामिल कई पीड़ित परिवारों ने सिर पर “हमें मारना बंद करो” लिखी पट्टियां बांधी थीं। उनका कहना था कि सेप्टिक टैंक की सफाई के दौरान लगातार हो रही मौतों को रोकने के लिए सरकार को प्रभावी कदम उठाने चाहिए।
सेप्टिक टैंक में मौत का दर्द, परिवारों ने सुनाई आपबीती
प्रदर्शन में शामिल द्वारका निवासी सत्यवती ने अपने जीजा अशोक कुमार की दर्दनाक मौत को याद किया। उन्होंने बताया कि वर्ष 2009 में दिल्ली नगर निगम (MCD) में कार्यरत अशोक कुमार की नरेला में एक सेप्टिक टैंक की सफाई के दौरान मौत हो गई थी।
सत्यवती ने कहा कि बिना सुरक्षा उपकरणों के कर्मचारियों को सेप्टिक टैंक में उतारना, उन्हें मौत के मुंह में धकेलने जैसा है।
25 साल से बिना सुरक्षा उपकरण कर रहे हैं काम
रोहिणी निवासी 60 वर्षीय पालेराम ने बताया कि वह पिछले 25 वर्षों से बिना किसी सुरक्षा किट और औपचारिक प्रशिक्षण के सेप्टिक टैंक साफ कर रहे हैं।
उन्होंने कहा कि शुरुआत में उन्हें झाड़ू लगाने के लिए 50 रुपये मिलते थे, लेकिन अधिक मजदूरी मिलने के कारण उन्होंने सेप्टिक टैंक साफ करने का काम शुरू किया।
पालेराम ने बताया कि उन्हें केवल टैंक में उतरने और उसे साफ करने का तरीका बताया गया, लेकिन आज तक कोई आधुनिक सुरक्षा उपकरण या प्रशिक्षण उपलब्ध नहीं कराया गया।
‘आज भी दस्तानों के भरोसे जान जोखिम में डालते हैं’
पालेराम ने कहा कि कुछ गैर-सरकारी संगठन (NGO) कभी-कभी दस्ताने उपलब्ध करा देते हैं, लेकिन इसके अलावा उन्हें किसी तरह की सुरक्षा किट नहीं मिलती।
उन्होंने बताया कि हाल ही में एक सेप्टिक टैंक के अंदर फिसलने से उनके पैर में फ्रैक्चर हो गया, लेकिन इसके बावजूद उन्हें इसी काम से रोजी-रोटी कमानी पड़ रही है।
‘ये हादसे नहीं, सरकार की निगरानी में हो रही हत्याएं’
पिछले 35 वर्षों से इस आंदोलन से जुड़ीं सामाजिक कार्यकर्ता दीप्ति सुकुमार ने कहा कि जब सरकार खुद मानती है कि यह काम बेहद खतरनाक है और इसमें लगातार लोगों की मौत हो रही है, तो इन्हें सिर्फ हादसा नहीं कहा जा सकता।
उन्होंने कहा कि ये “सरकार की निगरानी में होने वाली हत्याएं” हैं और इन पर तत्काल कार्रवाई की आवश्यकता है।
विशेषज्ञों ने उठाए सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल
अंबेडकर विश्वविद्यालय के एक शोधार्थी ने कहा कि देश में स्वच्छता अभियानों पर लगातार जोर दिया जा रहा है, लेकिन सबसे जोखिम भरा काम करने वाले सफाई कर्मचारियों को अब भी पर्याप्त सुरक्षा उपकरण और प्रशिक्षण उपलब्ध नहीं कराया गया है।
उन्होंने कहा कि आधुनिक तकनीक और सुरक्षा संसाधनों के अभाव में कर्मचारी आज भी अपनी जान जोखिम में डालकर काम करने को मजबूर हैं।
प्रदर्शन में शामिल हुए विपक्षी नेता
प्रदर्शन में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) की वरिष्ठ नेता वृंदा करात और राज्यसभा सांसद मनोज कुमार झा भी शामिल हुए।
वृंदा करात ने कहा कि सफाई कर्मचारी जीवित रहते हुए समाज और सरकार की नजरों से ओझल रहते हैं, जबकि उनकी मौत के बाद भी उन्हें न्याय नहीं मिल पाता।
जाति और पेशे के संबंध पर भी उठे सवाल
सांसद मनोज कुमार झा ने कहा कि सेप्टिक टैंक की सफाई जैसे सबसे जोखिम भरे कार्यों में बड़ी संख्या में सामाजिक रूप से वंचित और हाशिए पर रहने वाले समुदायों के लोग कार्यरत हैं।
उन्होंने कहा कि इन कर्मचारियों को पर्याप्त सुरक्षा, सम्मान और वैकल्पिक रोजगार उपलब्ध कराना सरकार की जिम्मेदारी है।
प्रदर्शनकारियों की प्रमुख मांगें
प्रदर्शन के दौरान सफाई कर्मचारियों और सामाजिक संगठनों ने सरकार से कई मांगें रखीं, जिनमें प्रमुख हैं—
मैनुअल स्कैवेंजर्स एक्ट, 2013 का देशभर में सख्ती से पालन।
सेप्टिक टैंक की मैनुअल सफाई पर पूरी तरह रोक।
सभी सफाई कर्मचारियों को आधुनिक सुरक्षा उपकरण और प्रशिक्षण उपलब्ध कराया जाए।
सेप्टिक टैंक हादसों में जान गंवाने वाले कर्मचारियों के परिवारों को उचित मुआवजा और पुनर्वास मिले।
मशीनों के माध्यम से सफाई व्यवस्था को पूरी तरह लागू किया जाए, ताकि किसी भी कर्मचारी की जान जोखिम में न पड़







