पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और कच्चे तेल (Crude Oil) की कीमतों में लगातार उतार-चढ़ाव के बीच वैश्विक कमोडिटी बाजार में अनिश्चितता का माहौल बना हुआ है। बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि तेल की ऊंची कीमतों से महंगाई बढ़ने की आशंका मजबूत हुई है। यदि इसके जवाब में दुनिया के प्रमुख केंद्रीय बैंक ब्याज दरों में कटौती टालते हैं या सख्त मौद्रिक नीति (Tight Monetary Policy) जारी रखते हैं, तो अल्पावधि में सोने और चांदी की कीमतों पर दबाव बना रह सकता है।
महंगाई और ब्याज दरें तय करेंगी सर्राफा बाजार की दिशा
विश्लेषकों के अनुसार, सामान्य परिस्थितियों में कच्चे तेल की कीमतों में तेजी से महंगाई बढ़ने की आशंका होती है, जिससे सोना और चांदी जैसी सुरक्षित निवेश परिसंपत्तियों (Safe Haven Assets) को समर्थन मिलता है। लेकिन यदि महंगाई को नियंत्रित करने के लिए केंद्रीय बैंक सख्त रुख अपनाते हैं, तो ऊंची ब्याज दरों के कारण कीमती धातुओं की तेजी सीमित हो सकती है।
अब बाजार की नजर केवल महंगाई के आंकड़ों पर नहीं, बल्कि इस बात पर भी है कि अमेरिकी फेडरल रिजर्व सहित दुनिया के प्रमुख केंद्रीय बैंक आगे क्या नीति अपनाते हैं।
इतिहास में तेल संकट से बढ़ी थी महंगाई
मोतीलाल ओसवाल फाइनेंशियल सर्विसेज लिमिटेड (MOFSL) के कमोडिटी विश्लेषक मानव मोदी के अनुसार, इतिहास गवाह है कि कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल से महंगाई का दबाव बढ़ा है। 1970 के दशक के तेल संकट और पश्चिम एशिया के कई भू-राजनीतिक संघर्षों के दौरान भी ऐसा देखने को मिला था।
उन्होंने कहा कि सामान्य हालात में तेल महंगा होने से सोना और चांदी मजबूत होते हैं, लेकिन हालिया अमेरिका-ईरान तनाव के दौरान बाजार ने पारंपरिक रुझान से अलग प्रदर्शन किया।
होर्मुज जलडमरूमध्य पर टिकी दुनिया की नजर
विशेषज्ञों का कहना है कि पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के कारण होर्मुज जलडमरूमध्य से होने वाली वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति प्रभावित होने की आशंका बनी हुई है। दुनिया के कुल तेल व्यापार का बड़ा हिस्सा इसी मार्ग से गुजरता है। ऐसे में यहां किसी भी तरह की बाधा का सीधा असर कच्चे तेल की कीमतों पर पड़ सकता है।
तेल में भारी उतार-चढ़ाव, सोना-चांदी में आई कमजोरी
पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ने से पहले फरवरी के अंत में ब्रेंट क्रूड लगभग 68 डॉलर प्रति बैरल पर कारोबार कर रहा था। अप्रैल के मध्य में तनाव चरम पर पहुंचने पर इसकी कीमत बढ़कर 126.41 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई। बाद में तनाव कम होने पर यह करीब 70 डॉलर तक फिसला, लेकिन फिर दोबारा बढ़कर लगभग 90 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गया।
दूसरी ओर, कीमती धातुओं में तेज गिरावट देखने को मिली। वर्ष की शुरुआत में रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचने के बाद सोने और चांदी की वायदा कीमतों में उल्लेखनीय कमजोरी दर्ज की गई।
क्यों नहीं बढ़ पा रहे सोना और चांदी?
विश्लेषकों का कहना है कि इस बार तेल की तेजी के बावजूद निवेशकों का ध्यान महंगाई से ज्यादा केंद्रीय बैंकों की नीतियों पर है। निवेशकों को आशंका है कि ऊर्जा कीमतों में वृद्धि के कारण ब्याज दरें लंबे समय तक ऊंचे स्तर पर बनी रह सकती हैं। यही वजह है कि सोना और चांदी अपेक्षित तेजी नहीं दिखा पा रहे हैं।
विशेषज्ञ बोले- केंद्रीय बैंकों के फैसले होंगे निर्णायक
एलकेपी सिक्योरिटीज के कमोडिटी एवं करेंसी रिसर्च प्रमुख जतिन त्रिवेदी का कहना है कि अब बाजार की दिशा इस बात पर निर्भर करेगी कि महंगाई बढ़ने की स्थिति में अमेरिकी फेडरल रिजर्व और अन्य केंद्रीय बैंक क्या कदम उठाते हैं।
उनके अनुसार, यदि ब्याज दरों में कटौती टलती है और सख्त मौद्रिक नीति जारी रहती है, तो निकट अवधि में सोने और चांदी की कीमतों पर दबाव बना रह सकता है। हालांकि, जब ऊंची ब्याज दरों का असर बाजार में पूरी तरह समाहित हो जाएगा और महंगाई की चिंता बनी रहेगी, तब निवेशक दोबारा सोने और चांदी को सुरक्षित निवेश विकल्प के रूप में अपनाना शुरू कर सकते हैं।
चांदी पर औद्योगिक मांग का भी असर
चॉइस ब्रोकिंग की कमोडिटी विश्लेषक कावेरी मोरे के अनुसार, चांदी केवल कीमती धातु ही नहीं बल्कि एक महत्वपूर्ण औद्योगिक धातु भी है। इसलिए ऊर्जा कीमतों में उतार-चढ़ाव, डॉलर इंडेक्स, अमेरिकी बॉन्ड यील्ड और वैश्विक औद्योगिक मांग का असर चांदी पर सोने की तुलना में अधिक पड़ता है।
निवेशकों को किन संकेतकों पर रखनी चाहिए नजर?
विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले समय में कमोडिटी बाजार की दिशा तय करने में कई वैश्विक कारक अहम भूमिका निभाएंगे। इनमें प्रमुख हैं—
कच्चे तेल की कीमतों में बदलाव
होर्मुज जलडमरूमध्य से जुड़े घटनाक्रम
वैश्विक महंगाई के आंकड़े
अमेरिकी फेडरल रिजर्व और अन्य केंद्रीय बैंकों के नीतिगत फैसले
अमेरिकी बॉन्ड यील्ड
डॉलर इंडेक्स की चाल
इन सभी कारकों के आधार पर ही आने वाले दिनों में सोना और चांदी की कीमतों की दिशा तय होने की संभावना है।







